Sunday, December 13, 2020

कविता ज़िन्दगी


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 ज़िन्दगी इत्तिफ़ाक़ है 

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कभी उमड़ी घटा, कभी गीली माटी की सौंध 

कभी शोला कभी शबनम सी लगा करती है ज़िन्दगी...


उगते सूरज सी रौशन न सही मगर

अंधेरों से लड़ कर चमकने का दम रखती है ज़िन्दगी....


जिस्म तो खिलौना मिट्टी का मिटने को ही बना

ताउम्र न जाने किस सफ़र में रहा करती है ज़िन्दगी....


 आसमानों से ऊँचे ख्वाहिशों के सफ़र जिनके 

 उन को इक बवाल सी लगा करती है ज़िन्दगी....


आग है के पानी , कतरा या समंदर

 हर अंदाज़ में खूब रंगीन हुआ करती है ज़िन्दगी....


जिया तुझको शिद्दत से ,महसूस किया ,जाना

समझने को फिर भी कम पड़ा करती है ज़िन्दगी....


तजरबा उनका,कहता महज इत्तिफ़ाक़ है 

मुझको तो खेल तमाशे सी लगा करती है ज़िन्दगी....

कविता घर गाँव औरतें


घर, गाँव, और औरतें 

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औरतें करती हैं तब्दील 

मकानों को घरों में 

अपनी हँसी से

आँसुओं से 

बातों से 

कभी कभी खामोशी से भी

तो कभी लफ़्फ़ाज़ी से...


झर झर बहती रहती हैं 

झरने सी 

घुली रहती हैं फ़िज़ा में 

महकी महकी पवन सी,

निकल जाती हैं वक़्त के संग 

इस पार से उस पार...


पहचानी जाती हैं अक्सर

शहरों के नाम से,

मायके में 

ससुराल के 

और ससुराल में 

मायके के शहर से...


भूली रहती हैं 

ख़ुद के रोज़बरोज़ में  

बहोत सी गैर ज़रूरी बातें 

क्योंकि

उनके पास तो हुआ करती है 

जादुई ताक़त 

किसी भी जगह को 

अपना घर बना लेने की ...


औरतें ख़्वाब में भी देखती है 

अपने पुराने गांव 

पेड़ों की छाँव, 

सावन के झूले, 

सारे रिश्ते, 

हँसी ठिठोली 

भूलता नहीं है उनको अपना कोई भी घर 

इसलिये तो भिगोती रहती हैं जब तब 

आँखों की कोर...


ज़िन्दगी की जद्दोजहद में 

मसरूफ़ 

मर्द नहीं सोच पाते इतना

और बनवाते हैं मकान 

अपनी दुलारी बेटी 

अपनी प्यारी बहन के लिए 

लेकिन नहीं रख पाते 

कोई एक कोना

जो हो सिर्फ उनका 

क्या हुआ फ़िक्र करते हैं वे उनकी...


बुलातें है वे उन्हें 

तीज त्यौहारों पर 

खबर भी रखते हैं उनकी 

एहतिराम भी करते हैं 

मगर मेहमान की तरह 

भर देते हैं बैग उनके रुखसती पर 

रख देते हैं हथेलियों पर 

बेशुमार नोट भी..

पसीजते हुए 

इन काग़ज़ के चंद टुकड़ों के साथ 

गीली हो जाती है रूह औरत की 

अन्दर तक

एक बोझ का एहसास 

नहीं लौटने देता उन्हें जल्द जल्द 

इस वाले घर में...


खो जाती हैं फिर से ये औरतें 

नहीं मिलतीं ढूँढने पर भी 

अपने पुराने घर में 

अपने बालपन के गाँव में 

फ़िसल जाती हैं वे यूँ 

जैसे कोई किरकिरी दानेदार रेत 

किसी भींची हुई मुट्ठी से...

औरत की

(काट छांट मुदिता गर्ग 😊, और विनोद सर द्वारा साभार !)

लफ़्फ़ाज़ी=वचालता, 

ऐहतिराम=सम्मान, 

रोज़ ब रोज़ =दिनचर्या से आशय है, 

रुखसती=विदाई, 

मसरूफ=व्यस्त

बहुत उदास हूँ मैं

 


बहुत उदास हूँ मैं 

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न जाने क्यों 

लगता है आजकल 

इधर से दृष्टि फेर ली है तुमने

और एक मैं हूं 

गहन उदासी और अवसाद की जद में

बेतहाशा

खिंचती चली जा रही हूं

जी चाहता है 

सारे बंधन तोड़ कर कहीं दूर भाग जाऊं

कोशिश भी की है कई बार

किन्तु आसान नहीं ना....

बहलाती हूं  

अपने मन को 

कहानियों कविताओं और रंगों में 

किंतु नाकामयाबी हाथ लगी हर बार...... 

कब से खबरें पढ़ना छोड़ दिया मैंने

लेकिन जैसे सारी उदास खबरें

तैर तैर कर 

मेरे आसपास इकट्ठी हो जाती हैं 

और मैं उस उदासी के भंवर में 

गोते लगाने लगती हूँ

कि तुम आओ और खींच लो मुझे बाहर


क्यों महसूस नहीं कर पा रही

यह पल पल बदलता 

खुशनुमा मौसम

 जी चाहता है 

चीख कर चीख कर बताऊं इस दुनिया को

 हां उदास ,बहुत उदास हूं मैं !!

आजकल ऐसे ऐसे लोग 

मुझे याद आने लगे हैं 

जिन्होंने कभी मुझे याद नहीं किया 

और ना याद करने का हक ही दिया..... 


मैं याचक तो नहीं थी

फिर भी आज 

याचना करती हूं

आ जाओ !!!

निकाल लो इस उदासी से बाहर मुझको ..

कर रही हूँ पल पल व्यतीत

इसी प्रतीक्षा में 

के तुम पुकार सुनोगे 

इससे पहले कि हार जाऊं मैं .....!!!

दिल दुखता है


दिल दुखता है 

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ग़म नहीं इसका के वो छोड़ गया है मुझको

उसने हर बात छुपाई,इस बात पे दिल दुखता है


छोड़ दिया मैंने जहाँ सारा मोहब्बत में जिसकी

वो मेरे सिवा ,सारे जहाँ की खबर रखता है 


राह तकती हूँ मैं नादां बेसब्रों सी जिसकी

लोग कहते हैं कि अब उसका अलग रस्ता है 


कहता था वो कि बस मैं हूँ नज़र में उसकी

झूठ ये उसका कांच की किरचों की तरह चुभता है 


बदल लेना साथी फितरत ही रही थी उसकी

मुझको तो आज भी वो अपना सा ही लगता है


वो गया जबसे जिगर चाक हुआ है ऐसे 

अब कहाँ बनने सवरने में दिल लगता है 


आज ग़मगीन हूँ कल ठीक भी हो जाऊंगी 

घाव गहरा हो गर ,भरने में तो वक़्त लगता है

प्रीति मिश्रा

मन की मल्लिका


मन की मल्लिका 

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अपनी धुन में ही रहती हूँ, कुछ गुन गुन करती रहती हूँ। 

                    आँखें  मेरी  सब  बोल  रही 

                     मुस्कान राज़  है खोल  रही 

                     परवाह नहीं कुछ भी मुझको 

                     तुम चाहे मुझको जो समझो 

                       

ना ताज कोई ना तख़्त मेरा मन के सिंहासन पर बैठी हूँ। 

                     कुछ गुन गुन करती रहती हूँ।। 


                     मात्र हृदय  पुष्प अर्पण   हेतु 

                     नहीं इसके सिवा कोई    सेतु

                     निश्छल हूँ  और भोली  भाली 

                      निष्कपट भाव  मिलने वाली                

                      


    नभ तक विस्तृत मेरा आँचल,किन्तु धरती पर बहती हूँ। 

                  कुछ गुन गुन करती रहती हूँ।। 

                    


                     गर प्रेम    से  मुझे  पुकारोगे

                      इर्द गिर्द स्वयं के पा   लोगे

                     तनिक मिला तिरिस्कार अगर

                     दृढ़ हूँ चलने को अपनी डगर


  तन कोमल दिखता है किन्तु मन से फ़ौलादी लड़की हूँ। 

                     कुछ गुन गुन करती रहती हूँ।।

दीप से दीप जला

 थीम सृजन-दीप से दीप जला 

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कुछ तुमसे सुनी जाए, कुछ तुम्हें सुनाया जाए

 अफ़साना मोहब्बत का,फिर से दोहराया जाए


ढोएं कब तक यूँ तन्हा गठरी ग़म की 

खोल दें दिल चलो कुछ बोझ घटाया जाए 


तग़ाफ़ुल ज़ख्मों का ,नासूर बना देता है

 दुआ - दवा करें मरहम भी लगाया जाए 


अपना चेहरा भी अनजान हुआ जाता है

आईना इक मेरे वास्ते लगाया जाए 


तुम चले जाओगे तो जान क्या रह पाएगी

खुद की साँसों के लिए तुमसे निभाया जाए


दाग दामन में औ' दिल में गिरहें काफी हैं 

सुलझा लें गांठों को ,दागों को मिटाया जाए 


हुआ एलान ये शहरे वफ़ा में कैसा

मिलने पे हुई पाबंदी,जश्न अकेले मनाया जाए


गर्द से हारे हैं सूरज चाँद और तारे 

दीप से दीप जला अंधेरों को मिटाया जाए

प्रीति मिश्रा


(सम्पादन के लिए मुदिता गर्ग का आभार)

कविता एक तस्वीर देखी है


एक तस्वीर देखी है.....

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पूनम की रात के उजले चाँद सी चमक देखी है

फूलों से आँखों के जुगनू ढँककर बैठी  है 

मैंने एक तस्वीर देखी है ....


घटाओं सी सुरमई 

ज़ुल्फ़ों में तितलियाँ, 

होठों की  नरमियाँ 

बयां करती है शोखियां 

दिल के तार छेड़ कर

जो अनजान हो गयी

 मैंने अल्हड़ शरीर एक लड़की देखी है.......


बहार कहूं तुझको या कहकशां कहूं

ज़मीं से  आसमान तक है तेरी अदा कहूं

मेरा सुकूँ छीनने वाली ऐ ज़ालिम दिलरुबा 

बंद आँखों के ख़्वाब सी तू हरदम दिखती रहती है

मैंने एक तस्वीर देखी है.......प्रीति मिश्रा